तरबूज की पीड़ा ….!

hats off!

The world's most useless writer

तरबूज की पीड़ा
वो न हिन्दू न मुसलमाँ है
ऊपर से हरे और
अंदर लाल रंग से परेशान हैं,
जमाने से तंग आकर
उसने भी अपने अधिकारों
की मांग की ओर
अलग मजहब बनाने की ठान ली,

जब सबके अपने मजहब है
सबका अपना अपना दीन धर्म है
तो उसका उत्पीड़न क्यों हो
मुसलमानो का हरे पर ओर
हिन्दू का लाल रंग पे अधिकार है
उसका जीना तो यहाँ धिक्कार है ,

कुछ बातों पर तुम लड़ जाते हो
कुछ पर खामोश हो दोंनो मौज उड़ाते हो
तुम्हारी मजहब की लड़ाई है तो
अब तय कर लो ,रंग के आधार पर
चीजों को पसंद कर लो ,

जिस तरह से धर्म मजहब के
नाम पे तुम रंगों को भी बांटते जा रहे है
कि हरा मुस्लिम का है
और लाल हिन्दू का रंग है
तो वो दिन दूर नही जब
सारी की सारी हरी सब्ज़ियाँ
मुस्लिमों की हों जाएँगी ,

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